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तुलना करना छोड़ो, सुकून पाना शुरू करो"

                                


खुद की तुलना दूसरों से करना: दुख और तनाव की असली जड़

                                 
                                 
                                             

आज की दुनिया में जहाँ सोशल मीडिया हर किसी की “परफेक्ट लाइफ” दिखाता है, वहां खुद की तुलना दूसरों से करना बहुत आम हो गया है। पर यही तुलना धीरे-धीरे हमारी खुशियों को खत्म और मन को बेचैन कर देती है।

     


तुलना क्यों करते हैं हम?

  1. दूसरों की सफलता को देखकर:
    जब हम किसी को आगे बढ़ते हुए देखते हैं, तो हम सोचते हैं — "मैं ऐसा क्यों नहीं कर पाया?"

  2. सोशल मीडिया की चमक:
    हम दूसरों की मुस्कुराहटें, छुट्टियाँ, गाड़ियाँ और उपलब्धियाँ देखते हैं, पर उनके संघर्ष नहीं।

  3. अपनी असुरक्षा:
    जब हम खुद को पूरी तरह स्वीकार नहीं करते, तो हम दूसरों में अपनी "कमियाँ" ढूंढने लगते हैं।


लेकिन तुलना का असर क्या होता है?

  • आत्मविश्वास में कमी

  • खुशियों का धीरे-धीरे खत्म होना

  • तनाव और बेचैनी का बढ़ना

  • निराशा और आत्म-तोड़ने वाला व्यवहार


क्या करें? समाधान क्या है?

  1. खुद से प्रतिस्पर्धा करें, दूसरों से नहीं।
    हर दिन अपने बीते हुए कल से बेहतर बनने की कोशिश करें।

  2. कृतज्ञता (Gratitude) अपनाएं।
    जो आपके पास है, पहले उसकी कद्र करें।

  3. सोशल मीडिया से थोड़ी दूरी बनाएं।
    असली जीवन में जिएं, नकली दुनिया की चमक में नहीं।

  4. अपने सफर पर भरोसा रखें।
    हर किसी की टाइमिंग अलग होती है, हर फल अपने वक्त पर ही पकता है।


एक प्रेरक पंक्ति:

"तुलना से केवल तनाव बढ़ता है, संतोष से जीवन सजता है।"

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