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अपने अंदर के डर को कैसे भगाएं

 

अपने अंदर के डर को कैसे भगाएं








हम सभी के जीवन में किसी न किसी प्रकार का डर होता है — यह डर असफलता का हो सकता है, अज्ञात का, या किसी और चीज का। डर एक स्वाभाविक मानवीय भावना है, लेकिन इसे हमारे ऊपर हावी नहीं होने देना चाहिए। भगवद् गीता और पुराणों में जीवन के भय से मुक्त होने के लिए कई गहन और व्यावहारिक शिक्षाएं दी गई हैं। आइए इन शास्त्रों की दृष्टि से डर को भगाने के उपायों पर चर्चा करें।

1. अज्ञान को मिटाना

गीता के अनुसार, डर का मुख्य कारण अज्ञान (अविद्या) है। जब हम अपने सच्चे स्वरूप (आत्मा) को नहीं पहचानते, तो संसार के भौतिक अनुभव हमें भयभीत कर सकते हैं। गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं:

"ज्ञान अग्नि से सभी कर्मों को भस्म किया जा सकता है।"

अतः, आत्मा का ज्ञान प्राप्त करें। जब आप यह समझने लगते हैं कि आप शाश्वत आत्मा हैं और मृत्यु या असफलता केवल भौतिक शरीर और मन के स्तर पर होती है, तो डर स्वतः समाप्त होने लगता है।

2. कर्म पर ध्यान केंद्रित करना

गीता में भगवान कृष्ण अर्जुन से कहते हैं:

"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।" 

इसका अर्थ है कि हमें अपने कर्तव्यों पर ध्यान देना चाहिए, न कि उनके परिणामों पर। डर का एक बड़ा कारण यह होता है कि हम अपने कार्यों के परिणाम के बारे में चिंतित रहते हैं। लेकिन यदि हम केवल अपने कर्म पर ध्यान केंद्रित करें और फल की चिंता छोड़ दें, तो डर दूर हो सकता है।

3. भक्ति और समर्पण

भगवद गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं:

"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।" 

भगवान में पूर्ण विश्वास और समर्पण से सभी प्रकार के भय समाप्त हो जाते हैं। जब हम यह मान लेते हैं कि भगवान हमारे साथ हैं और हमारा कल्याण करेंगे, तो डर हमें प्रभावित नहीं कर सकता।

4. मृत्यु का भय मिटाना

गीता के अनुसार, आत्मा अमर है और शरीर केवल एक वस्त्र की तरह है। मृत्यु केवल पुराने वस्त्रों को छोड़कर नए वस्त्र धारण करने के समान है। यह दृष्टिकोण हमें मृत्यु के डर से मुक्त करता है:

"वासांसि जीर्णानि यथा विहाय, नवीनानि गृह्णाति नरो’पराणि।"

जब हमें यह समझ आ जाती है कि आत्मा को कोई नुकसान नहीं हो सकता, तो हम मृत्यु या अन्य प्रकार के भय से मुक्त हो सकते हैं।

5. सत्संग और ध्यान

पुराणों में कहा गया है कि सत्संग (सज्जनों और ज्ञानी व्यक्तियों का संग) और ध्यान (मेडिटेशन) भय को कम करने में अत्यधिक सहायक होते हैं। ध्यान से मन शांत होता है और भय धीरे-धीरे दूर होता है। विष्णु पुराण में लिखा है कि भगवान के नाम का जप और सत्संग से भयमुक्त जीवन संभव है।

6. धैर्य और सहनशीलता का अभ्यास

गीता में भगवान कृष्ण ने धैर्य और सहनशीलता को भय पर विजय पाने का महत्वपूर्ण साधन बताया है। वे कहते हैं:

"समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते।" 

अर्थात, सुख और दुख को समान रूप से स्वीकार करने वाला व्यक्ति अमरता (मोक्ष) के योग्य बनता है। डर को भगाने के लिए हमें अपने जीवन की परिस्थितियों को धैर्य और सहनशीलता के साथ स्वीकार करना सीखना चाहिए।

7. योग और प्राणायाम

गीता और योग शास्त्र में योग और प्राणायाम का महत्व बताया गया है। नियमित योगाभ्यास से मन और शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है, जिससे डर और नकारात्मकता दूर होती है। प्राणायाम से मन की शांति और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है।

निष्कर्ष

भगवद गीता और पुराणों की शिक्षाएं हमें यह समझने में मदद करती हैं कि डर केवल हमारे मन का एक भ्रम है। आत्मज्ञान, भक्ति, ध्यान, और सत्संग के माध्यम से हम अपने डर को भगा सकते हैं। जब हम अपने जीवन में इन दिव्य शिक्षाओं को अपनाते हैं, तो डर हमारे जीवन से गायब हो जाता है और उसकी जगह साहस, शांति और आनंद ले लेते हैं।

इसलिए, इन अमूल्य शिक्षाओं को अपने जीवन में अपनाइए और डरमुक्त जीवन जीने का आनंद उठाइए।

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