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खुद को कैसे बदले । गीता मे इसके लिया क्या लिखा है

 खुद को बदले

 में परिवर्तन ही एकमात्र स्थायी सत्य है। लेकिन जब हम किसी बदलाव की अपेक्षा करते हैं, तो अक्सर हमारी उंगली दूसरों की ओर उठती है। हम सोचते हैं कि अगर दुनिया, परिस्थितियाँ, या दूसरे लोग बदल जाएँ, तो हमारा जीवन बेहतर हो जाएगा। लेकिन श्रीमद्भगवद्गीता हमें सिखाती है कि असली बदलाव दूसरों में नहीं, बल्कि खुद में लाने से होता है। यही आत्म-परिवर्तन का मार्ग भक्ति और अध्यात्म का मूल संदेश है।







गीता का संदेश: आत्मा पर ध्यान केंद्रित करो

भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को युद्ध के मैदान में जो उपदेश दिया, वह केवल एक धर्मयुद्ध तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे जीवन की हर स्थिति में लागू होता है। गीता के अनुसार, “अपनी आत्मा को पहचानो और उसे शुद्ध करो। जब तुम अपने अंदर परिवर्तन लाओगे, तभी बाहरी संसार में भी तुम्हें शांति और संतुलन मिलेगा।”

  • योग का महत्व: गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं, "योग: कर्मसु कौशलम्" (योग कर्म में कौशल है)। इसका अर्थ है कि जब हम अपनी सोच और कार्यों को शुद्ध करते हैं, तो हमारे कर्म भी परिष्कृत हो जाते हैं।

  • स्वधर्म पालन: हर व्यक्ति का स्वधर्म अलग है। दूसरों की जिम्मेदारी लेने से पहले हमें अपने कर्तव्यों को समझकर उन्हें निभाना चाहिए।

भक्ति मार्ग में आत्म-परिवर्तन

भक्ति का मार्ग हमें यह सिखाता है कि परमात्मा की ओर बढ़ने का सबसे सच्चा तरीका खुद को सुधारना है। दूसरों को बदलने का प्रयास करने से बेहतर है कि हम अपनी आदतों, विचारों और दृष्टिकोण को बदलें। भक्ति के माध्यम से आत्म-परिवर्तन कैसे संभव है?

  1. स्वीकृति और विनम्रता: भगवान की भक्ति हमें सिखाती है कि हम अपनी कमजोरियों को स्वीकार करें और उन्हें सुधारने के लिए विनम्र बनें।

  2. नकारात्मकता का त्याग: भक्ति से हमारा मन शांत होता है और हम ईर्ष्या, क्रोध और घमंड जैसी नकारात्मक भावनाओं से मुक्त होते हैं।

  3. ध्यान और प्रार्थना: ध्यान के माध्यम से हम अपनी आत्मा के साथ जुड़ते हैं और परमात्मा का मार्गदर्शन पाते हैं। यह प्रक्रिया हमारे अंदर की अराजकता को समाप्त कर हमें एक स्थिरता प्रदान करती है।

उदाहरण: अर्जुन का आत्म-परिवर्तन

अर्जुन, जो कि महाभारत के युद्ध में संदेह और भय से घिरा हुआ था, भगवान कृष्ण के उपदेशों से प्रेरित होकर अपनी आत्मा के प्रति जागरूक हुआ। उसने अपने अंदर के डर और भ्रम को त्यागकर अपने कर्तव्यों को निभाया। यह हमें सिखाता है कि जब हम अपने अंदर बदलाव लाते हैं, तो हम जीवन की हर चुनौती का सामना करने के लिए तैयार हो जाते हैं।

आत्म-परिवर्तन के 5 चरण

  1. स्वयं को जानो: introspection के माध्यम से अपनी ताकत और कमजोरियों को पहचानें।

  2. ध्यान और प्रार्थना: अपने मन को केंद्रित करने के लिए भगवान के नाम का स्मरण करें।

  3. सकारात्मक सोच अपनाओ: दूसरों में दोष देखने के बजाय उनके गुणों को पहचानें।

  4. कर्तव्यों का पालन करें: अपने कार्यों को बिना फल की चिंता किए निष्काम भाव से करें।

  5. भगवान पर विश्वास रखें: यह विश्वास रखें कि हर बदलाव आपके और संसार के लिए श्रेष्ठ होगा।

निष्कर्ष

गीता हमें सिखाती है कि बाहरी संसार को बदलने का प्रयास करने से बेहतर है कि हम अपने अंदर झाँकें और खुद को बदलें। जब हम अपने भीतर का अंधकार दूर करेंगे, तभी हमें बाहरी संसार प्रकाशमय दिखाई देगा। भगवान कृष्ण का यह उपदेश हमें याद दिलाता है कि आत्म-परिवर्तन से ही सच्ची शांति, खुशी और मुक्ति प्राप्त होती है। इसलिए, दूसरों को नहीं, खुद को बदलने का संकल्प लें और भक्ति के मार्ग पर चलें। यही जीवन की असली विजय है।

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